सँभाल जगजाल में काल दरहाल
रे भाई! सँभाल जगजाल में काल दरहाल रे ॥टेक॥
कोड़ जोधा को जीतै छिनमें, एकलो एक हि सूर ।
कोड़ सूर अस धूर कर डारै, जमकी भौंह करूर ॥
रे भाई! सँभाल जगजाल में काल दरहाल रे ॥१॥
लोहमें कोट सौ कोट बनाओ, सिंह रखो चहुंओर ।
इंद, फनिंद, नरिंद चौकि दैं, नहिं छोडै, मृतु जोर ॥
रे भाई! सँभाल जगजाल में काल दरहाल रे ॥२॥
शैल जलै जस आग वलै सो, क्यों छोडै तिन सोय ।
देव सबै इक काल भखै है, नरमें क्या बल होय ॥
रे भाई! सँभाल जगजाल में काल दरहाल रे ॥३॥
देहधारी भये भूपर जे जे, ते खाये सब मौत ।
‘द्यानतराय’ धर्म को धार चलो शिव, मौत को करके फौत ॥
रे भाई! सँभाल जगजाल में काल दरहाल रे ॥४॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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