शुद्ध स्वरूपको वंदना हमारी
शुद्ध स्वरूपको वंदना हमारी…
एक रूप वसुरूप विराजै, सुगुन अनन्त रूप अविकारी॥शुद्ध. ॥१॥
अमल अचल अविकलप अजलपी, परमानंद चेतनाधारी ॥शुद्ध. ॥२॥
‘द्यानत’ द्वैतभाव तज हूजै, भाव अद्वैत सदा सुखकारी॥शुद्ध. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ५९
खोज: Shuddh Swarupko Vandana Hamari
अर्थ
हम आत्मा के शुद्ध स्वरूप की वंदना करते हैं। वह सदा एकरूप है। शिवरूप में, अपने शुद्धरूप में विराजित है, अनन्त गुणसहित व दोषरहित है।
वह मलरहित-निर्मल, स्थिर, विकल्परहित, अवर्णनीय, परम आनन्द का धारी है, चैतन्य है।
द्यानतराय कहते हैं कि द्वैतभाव को छोड़कर मात्र अपने स्वभाव में, अद्वैत में ठहरना सुखकारी है अर्थात् अपने आत्मा में ही ध्यानमग्न होना, स्थिर होना सुखकारी है।
शब्दार्थ: वसुरूप - शुद्ध रूप
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 154।
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