समझ मन स्वारथ का संसार | Samajh Man Swarath Ka Sansar

समझ मन स्वारथ का संसार

समझ मन स्वारथ का संसार ॥टेक॥

हरे वृक्ष पर पक्षी बैठा, गावे राग मल्हार ।
सूखा वृक्ष गयो उड पक्षी, तजकर उनमें प्यार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥१॥

बैल वही मालिक घर आवत, तावत बांधो द्वार ।
वृद्ध भयो तब नेह न कीन्हो, दीनो तुरत बिसार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥२॥

पुत्र कमाऊ सब घर चाहे, पानी पीवे वार ।
भयो नखट्टू दुर दुर पर पर, होवत बारंबार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥३॥

ताल पाल पर डेरा कीनो, सारस नीर निहार ।
सूखा नीर ताल को तज गए, उड गए पंख पसार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥४॥

जब तक स्वारथ सधे तभी तक, अपना सब परिवार ।
नातर बात न पूछे कोई, सब बिछड़े संग छार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥५॥

स्वारथ तज जिनगृह परमारथ, किया जगत उपकार ।
‘ज्योति’ ऐसे अमर देव के, गुण चिंते हर बार ॥
समझ मन स्वारथ का संसार ॥६॥


स्रोत: nikkyjain.github.io (अध्यात्म भजन)

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