हो तुम शठ अविचारी जियरा, जिनवृष पाय वृथा खोवत हो
हो तुम शठ अविचारी जियरा, जिनवृष पाय वृथा खोवत हो ।।टेक।।
पी अनादि मदमोहस्वगुननिधि, भूल अचेत नींद सोवत हो ।।
स्वहित सीखवच सुगुरु पुकारत, क्यों न खोल उर-दृग जोवत हो ।
ज्ञान विसार विषयविष चाखत, सुरतरु जारि कनक बोवत हो ।।१।।
स्वारथ सगे सकल जनकारन, क्यों निज पापभार ढोवत हो ।
नरभव सुकुल जैनवृष नौका, लहि निज क्यों भवजल डुबोवत हो ।।२।।
पुण्यपापफल वातव्याधिवश, छिनमें हँसत छिनक रोवत हो ।
संयमसलिल लेय निजउर के, कलिमल क्यों न ‘दौल’ धोवत हो ।।३।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १३८
अर्थ
अर्थ-हे जीव ! तुम वास्तव में बड़े मूर्ख और अविचारी हो, जो जिनधर्म को पाकर भी व्यर्थ खो रहे हो। तुम अनादिकाल से मोहरूपी मदिरा पी रखी है और तुम अपने अनन्त गुणो के भण्डार को भूलकर अत्यन्त गहरी नींद में सो रहे हो। हे जीव। सद्गुरुदेव तुम्हे आत्महित की शिक्षा देते हुए पुकार रहे हैं, तुम अपने हृदय की आंखे खोलकर क्यों नहीं देखते हो? तथा तुम अपने ज्ञान को भूलकर जो विपयरूपी विष का भक्षण कर रहे हो, सो ऐसा है मानो कल्पवृक्ष को जलाकर धतूरा बो रहे हो। हे जीव ! संसार में सभी लोग स्वार्थ के सगे हैं। तुम उनके कारण अपने ऊपर पाप का बोझा क्यो ढो रहे हो? मनुष्य भव, उत्तम कुल और जिनधर्म रूपी नौका को पाकर भी अब तुम अपने आपको संसार-सागर में क्यो डुबो रहे हो ? तुम पुण्य-पाप के फलरूपी वातरोग से पीड़ित हो, अतः क्षण में हँसते हो ओर क्षण में रोते हो।
कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे जीव तुम संयमरूपी जल लेकर अपने हृदय के पापरूपी मल को क्यो नहीं धोते हो ?
स्रोत: दौलत विलास, पद 105।
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