सम्बोधन | sambodhana

सम्बोधन !

पर की चिन्ता त्याग आत्मन् ! आतम हित में लाग।
तोड़ सकल जग द्वन्द-फन्द तू निज स्वभाव में पाग ॥ टेक ॥
पर से कुछ सम्बन्ध नहीं है, स्व-स्वामित्व अभाव।
नहीं कर्तृत्व सु दो द्रव्यों में, है अत्यन्ताभाव॥ 1 ॥

कार्य विकल्पों से नहीं होवे, है स्वाधीन स्वभाव।
होने योग्य सु होय परिणमन, आराधो निज भाव ॥ 2 ॥

निज-निज कर्मों के फल से ही, बने अनादि बनाव ।
कर्म न कोई देवे लेवे, तू क्यों करे विभाव॥ ३॥

सभी जीव दुःख-सुख को वेदें, जैसे होवें भाव।
अज्ञानी नित रहे आकुलित, भले करे सुख चाह ॥ 4 ॥

ज्ञानी भेदज्ञान के बल से, धारें समता भाव।
पूर्व कर्म तब झड़ते जावें, ये ही सत्य उपाय॥ 5॥

अखिल विश्व में कुछ भी करने का, न दिखे अवकाश।
दृष्टा-ज्ञाता रहो सहज ही, सुख है अपने पास ॥ 6॥

भूल स्वयं को जो दुःख पावे, सुखी करे फिर कौन।
निजानंद रस निज में वेदे, दुःखी करे फिर कौन ॥ 7 ॥

रहो सहज निर्भार आत्मन्, झूठे अध्यवसान ।
ये संसार चलेगा यों ही, साधो साध्य महान् ॥ 8॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’