श्री नंदीश्वर भक्ति | Shri Nandishwar Bhakti

नंदीश्वर पूजूँ, भक्ति सहित सुखकार ।
जिनमंदिर जिन प्रतिमा देखूँ, अपने ज्ञान मंझार ॥ टेक॥

जाने की शक्ति नहिं यद्यपि, अंतर शक्ति अपार ।
अंतर दृष्टि से ही पाऊं, तृप्ति अपरम्पार ॥1॥

आगम चक्षु से मैं जानूँ, चिंतू प्रभु गुण सार ।
चिंतत भेदविज्ञान जगे, अर दीखे जगत् असार ॥2॥

प्रभु सम अपना रूप न जाना, भ्रमत फिर्यो संसार ।
वन्दत दुःख पलायो तत्क्षण, भासे निज पद सार ॥3॥

बावन जिनमंदिर अकृत्रिम, अनुपम नित अविकार ।
त्यों ही अकृत्रिम शुद्धातम, गुण अनंत भंडार ॥4॥

धन्य घड़ी प्रत्यक्ष निहारूँ, प्रभु तेरा उपकार ।
तुम सम ही निज में रम जाऊँ, आवागमन निवार ॥5॥


स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७९ से २८०

1 Like