अष्टाह्निका पर्व (अठाई) वर्ष में तीन बार आता है: आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक, आठ दिन।
इस वर्ष कार्तिक अष्टाह्निका: कार्तिक शुक्ल अष्टमी, मंगलवार 17 नवम्बर 2026 से कार्तिक पूर्णिमा, मंगलवार 24 नवम्बर 2026 तक (दिल्ली पंचांग अनुसार, अपने स्थान का जैन पंचांग भी देख लें)।
नीचे के सब श्लोक, गाथा और अर्थ फोरम पर उपलब्ध ग्रंथों से ज्यों के त्यों लिए हैं, स्रोत हर खण्ड के साथ है।
१. क्या: तीन बार, अष्टमी से पूर्णिमा
लोकविभाग (श्री सिंहसूरर्षि), श्लोक ५२ से ५४
प्रतिवत्सरमाषाढ़े कार्तिके फाल्गुनेऽपि च ।
अष्टमीतिथिमारभ्य पूर्णिमान्तं सुरैः सह ॥ ५२
सौधर्मचमरेषानवैरोचनसुरेश्वराः ।
प्राच्यपाचीप्रतीचोषु उदीच्यां क्रमशो मुदा ॥ ५३
द्वौ द्वौ यामौ जिनेन्द्राणां महाविभवसंयुताः ।
प्रादक्षिण्येन कुर्वन्ति महाभक्त्या महामहम् ॥ ५४
अर्थ: प्रतिवर्ष यहां आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मासमें [शुक्ल पक्षमें] अष्टमीसे लेकर पूर्णिमा तक अर्थात् अष्टाह्निक पर्वमें अन्य देवोंके साथ सौधर्म, चमर, ईशान और वैरोचन ये चार इन्द्र हर्षित होकर क्रमसे पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशामें महाविभूतिके साथ भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणक्रमसे दो दो पहर तक जिनेन्द्रोंकी महामह पूजाको करते हैं ॥ ५२ से ५४ ॥
२. क्यों: देव नन्दीश्वर द्वीप जाते हैं, हम यहीं पूजते हैं
सिद्धान्तसार दीपक (आचार्य सकलकीर्ति), श्लोक ३३८ से ३४०
आषाढे कार्तिके मासे फाल्गुने च निरन्तरम्।
प्रतिवर्षं सुरैः सार्धं चतुर्निकायवासवाः ॥३३८॥
स्वस्वसद्वाहनारूढाः सकलत्राः शुभाशयाः।
विभूत्या परया भक्त्यागत्यारभ्याष्टमीदिनम् ॥३३९॥
आष्टाह्निकीं महापूजां कुर्वन्ति पुण्यमातृकाम्।
त्रिजगन्नाथमूर्तीनां विश्वचैत्यालयेषु च ॥३४०॥
अर्थ (ग्रंथ से): प्रतिवर्ष निरन्तर आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में चतुर्निकाय के इन्द्र, देवों एवं देवांगनाओं के साथ अपने-अपने उत्तम वाहनों पर चढ़कर परम विभूति और परमोत्कृष्ट भक्ति से अष्टमी को नन्दीश्वर द्वीप जाकर सर्व चैत्यालयों में स्थित जिनबिम्बों की पुण्य की माता सदृश आष्टाह्निकी नाम की महापूजा करते हैं।
श्री नन्दीश्वर द्वीप (अष्टाह्निका पर्व) पूजन, कवि द्यानतराय जी
सरब-परव में बड़ो अठाई परव है ।
नंदीश्वर सुर जाहिं लेय वसु दरब है ॥
हमें सकति सो नाहिं इहाँ करि थापना ।
पूजें जिनगृह-प्रतिमा है हित आपना ॥
भाव: नन्दीश्वर आठवाँ द्वीप है, वहाँ मनुष्य नहीं जा सकते, केवल देव जाते हैं। इसलिए इन आठ दिनों में हम यहीं स्थापना करके उन बावन जिनालयों की प्रतिमाओं की पूजा करते हैं।
३. नन्दीश्वर द्वीप के बावन जिनालय
त्रिलोकसार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती), गाथा ९७३ एवं ९७६
तव्वावण्णणगेसुवि बावण्णजिणालया हवंति तहिं ।
सोहम्मादी बारसकप्पिंदा ससुराभवणतिया ॥ ९७३ ॥
पडिवरिसं आसाढे तह कत्तियफग्गुणे य अट्ठमिदो ।
पुण्णदिणोत्ति यभिक्खं दो दो पहरं तु ससुरेहिं ॥ ९७६ ॥
अर्थ (ग्रंथ से, अंश): उन बावन पर्वतों पर बावन ही जिनालय हैं। … नन्दीश्वर द्वीप जाकर प्रत्येक वर्ष की आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास की अष्टमी से प्रारम्भ कर पूर्णिमा पर्यन्त निरन्तर दो दो पहर तक कल्याण अर्थात् ऐन्द्रध्वज आदि पूजन करते हैं॥
श्री नन्दीश्वर द्वीप पूजन, जयमाला
कार्तिक फाल्गुन साढ़ के, अंत-आठ-दिन माँहिं ।
नंदीश्वर सुर जात हैं, हम पूजें इह ठाहिं ॥१॥
चार-दिशि चार अंजनगिरी राजहीं ।
सहस-चौरासिया एक दिशि छाजहीं ॥
ढोल सम गोल ऊपर तले सुन्दरं ।
भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥३॥
शैल-बत्तीस इक सहस जोजन कहे ।
चार सोलै मिलैं सर्व बावन लहे ॥
एक-इक सीस पर एक जिनमंदिरं ।
भौन-बावन्न प्रतिमा नमूं सुखकरं ॥६॥
बिंब अठ एक सौ रतनमयि सोहहीं ।
देव देवी सरब नयन मन मोहहीं ॥
भाव: चार दिशाओं में चार अंजनगिरि, सोलह दधिमुख और बत्तीस रतिकर, कुल बावन पर्वत। हर पर्वत के शिखर पर एक जिनमन्दिर, हर मन्दिर में एक सौ आठ रत्नमयी प्रतिमाएँ।
४. कैसे: इन आठ दिनों में
- प्रतिदिन नन्दीश्वर द्वीप पूजन (नीचे सब पूजन एक जगह)
- जहाँ सम्भव हो, सिद्धचक्र या नन्दीश्वर विधान
- स्वाध्याय: त्रिलोकसार, लोकविभाग में नन्दीश्वर द्वीप का वर्णन
नन्दीश्वर पूजन, विधान, भक्ति: सब एक जगह
पूजन
- श्री नन्दीश्वर द्वीप (अष्टाह्निका पर्व) पूजन (कवि द्यानतराय जी)
- श्री नन्दीश्वर द्वीप पूजन 2
- श्री नंदीश्वर द्वीप पूजन
- श्री नन्दीश्वर द्वीप पूजन (कवि राजमल पवैया)
- श्री पंचमेरु पूजन
विधान
भक्ति, स्तुति, भजन