तर्ज : आओ भाई तुम्हें सुनायें गाथा आतम राम की …
शान्त स्वरूप अहो अन्तर में, बहती समरस धार रे।
अन्तर्दृष्टि हुई हे स्वामी, आनन्द अपरम्पार रे।। टेक।।
ज्ञायक प्रभु हूँ अनुभव वर्ते, सहज हुआ भव पार रे।
सहज पूज्य हे शान्ति जिनेश्वर, सहज नमन अविकार रे ।। 1 ।।
अमृतपान करूँ अन्तर में, चाह न अन्य लगार रे।
सहज तुष्ट वर्तुं निज में ही, वर्ते तृप्ति अपार रे।। 2।।
नहीं विकल्प प्रभु नहीं द्वन्द्व कुछ, साम्य भाव सुखकार रे।
रहूँ मुक्त ज्ञाता-दृष्टा प्रभु, अपने ही आधार रे।। 3।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १००
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’