तर्ज : माता तू दया करके कर्मों से छुड़ा देना …
हे चन्द्रप्रभ जिनराज ! मूरति मंगलकारी ।
दर्शन करके महाराज, आनन्द भयो भारी।। टेक।।
जिनरूप परम शीतल, देखे भव ताप नशे।
सन्तुष्टि सहज ही हो, प्रभु चाह- दाह विनशे।।
झरता है धर्मामृत, दुःख जन्म-मरण हारी।। 1।।
जिसको पाये बिन देव, भव-भव में भटकाए।
विभु ! निश्चय रत्नत्रय, निज ही में प्रगटाए।।
मुक्ति का मार्ग मिले, प्रभु सहजहिं अविकारी।। 2।।
जब से तुमको देखा, संसार असार दिखा।
प्रभु परम सार ज्ञायक, अन्तर में प्रत्यक्ष लखा।।
निर्ग्रन्थ दशा प्रगटे जिन-शासन सुखकारी।। 3।।
आदर्श रहो मेरे, मैं चूक नहीं जाऊँ ।
पुण्योदय में स्वामिन्, किंचित् नहीं अटकाऊँ।।
परमार्थ नमन जिनवर, पद प्रगटे अविकारी।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’