निज स्वभाव की महिमा जागी, सम्यक् श्रद्धा सहज हुई ।
स्वानुभूति मंगलमय प्रगटी, मिथ्या भ्रान्ति दूर हुई ।। टेक ।।
निज में ही तृप्ति जब पाई, तब थिरता का भाव जगा।
राग-रंग निस्सार दिखे सब, अन्तर्मुख पुरुषार्थ भया।। 1।।
दुःखमय गृहस्थपना छूटा, सम्यक् मुनिधर्म का उदय हुआ।
प्रचुर स्व-संवेदनमय जीवन, भविजन को आदर्श हुआ ।। 2 ।।
ध्येय रूप में मग्न हुए प्रभु, शुक्लध्यान था प्रगटाया।
हुआ क्षपक श्रेणी आरोहण, अनंत चतुष्टय विलसाया।। 3।।
त्रिजग पूज्य ईश्वरता पाई, अर्हत् नाम प्रसिद्ध हुआ।
योग निरोध हुआ तब क्षण में, अघाति समूह भी नष्ट हुआ।।4।।
अशरीरी प्रभु सर्व कर्ममल वर्जित सिद्ध महंत हुए।
अक्षय सुखमय ध्रुवगति पाई, आवागमन विमुक्त हुए।। 5 ।।
ज्यों प्रभु जाननहार आप हो, मैं भी जाननहार अहो।
भेद विकल्प नहीं उपजावे, स्वानुभूति मंगलमय हो।। 6।।
निज प्रभुता में मग्न रहूँ, नित स्वयं सिद्ध प्रभु ध्याऊँगा।
बदली दिशा अहो ! जीवन की, सिद्ध दशा प्रगटाऊँगा।। 7 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७५ से ७६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’