सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर | sammeda shikhara sammeda shikhara

सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर।

सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर ।। टेक ।।

होता कर्मों का अन्त यहाँ,
पाए मुनि मुक्ति अनन्त यहाँ।
तप करते आए सन्त यहाँ,
यह सिद्धक्षेत्र गिरिराज अमर ।।
चिर शान्ति यहाँ पर रही बिखर।
सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर ।। 1।।

मिलती आध्यात्मिक ऋद्धि यहाँ,
मिलती सद्धर्म समृद्धि यहाँ।
होती श्रद्धा की वृद्धि यहाँ,
होती सद्ज्ञान विवृद्धि यहाँ।।
होता सम्यग्चारित्र प्रवर ।
सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर ।। 2।।

तीर्थंकर भी दो-एक नहीं,
पाए हैं मोक्ष अनेक यहीं।
पाए विद्वान् विवेक यहीं,
छूटा उनका अविवेक यहीं।।
औ गया आत्मा का रूप निखर।
सम्मेदशिखर, सम्मेदशिखर ।। 3।।

निर्भयता चारों और यहाँ,
रहते न लुटेरे चोर यहाँ।
जन होते हर्ष विभोर यहाँ,
नचने लगता मन मोर यहाँ।।
यात्रा करते सब बन्धु मित्र।
सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर ।। 4।।

दर्शन पाते न अभव्य कभी,
यह नहीं उन्हें दृष्टव्य कभी।
पर जिन्हें मोक्ष गन्तव्य कभी,
मिलना आकर वे भव्य सभी ।।
करते कर्मों को तितर-वितर।
सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर ।। 5।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०१ से ३०२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’