तर्जः जन्म मरण का दुखिया…
सुनलो प्रभु अरज हमारी, मोहि जिनवर शरण तुम्हारी ।। टेक ।।
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु तुम, अशरण शरण कहाते हो।
शरणागत आए आत्मार्थी, वापस ना लौटाते हो।।
निरखत ही निज ज्योति जगे, निज आनन्द होत अपारी ।। 1 ।।
चिदानन्द चिद्रूप अनुपम, अचल अमल अविनाशी हो।
शाश्वत निज सुख दिखा रहे, तुम स्वाभाविक सन्यासी हो।।
ऐसो ही प्रभु हमको दीजो, शाश्वत सुख अविकारी।। 2 ।।
मैं हूँ एक अरूपी पूरण, शुद्ध सर्वज्ञ स्वभावी हूँ।
भाव शुभाशुभ रहित आत्म ध्रुव, कारण समय स्वरूपी हूँ ।।
अनेकान्त स्व-चतुष्टय ज्ञायक, सिद्ध स्वयं अविकारी।। 3 ।।
धन्य जनम श्रावक कुल पायो, धन्य सु संगति जिनगुरु की।
धनि जिनवाणी ज्ञान कला, सिखलायी हमको निज गुण की ।।
धन्य भयो मैं आज प्रभु जी, आप मिले भवतारी।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’