सुनि सुजान! पांचों रिपु वश करि, सुहित करन असमर्थ अवश करि
सुनि सुजान! पांचों रिपु वश करि, सुहित करन असमर्थ अवश करि ।
जैसै जड़ खखारको कीड़ा, सुहित सम्हाल सकैं नहिं फंस करि ।।
पांचन को मुखिया मन चंचल, पहले ताहि पकर, रस कस करि ।
समझ देखि नायक के जीतै, जै है भाजि सहज सब लसकरि ।।१।।
इंद्रियलीन जनम सब खोयो, बाकी चल्या जात है खस करि ।
‘भूधर’ सीख मान सतगुरुकी, इनसों प्रीति तोरि अब वश करि ।।२।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ११०
अर्थ
हे ज्ञानी सुनो! अपना हित करने के लिए पाँचों इन्द्रियरूपी शत्रुओं को शक्तिहीन-बलहीन कर अपने वश में करो।
जैसे खखार अर्थात् थूके गए कफ में फँसा हुआ कीड़ा अपने को असहाय पाता है, अपने हित को नहीं संभाल पाता वैसे ही इन इन्द्रिय-विषयों में फँसे होने के कारण जीव अपना हित करने में असमर्थ होता है, बेबस हो जाता है।
इन पाँचों इंद्रियों का मुखिया यह चंचल मन है। सबसे पहले उसे पकड़, वश में कर फिर रस अर्थात् स्वाद को जीभ को कस (वश में कर)। अपने नायक को जीत लिया (हारा हुआ) जानकर इसकी सारी सेना सहज ही हार स्वीकार कर लेगी, कमज़ोर पड़ जायेगी, भाग जायेगी।
इन्द्रियों के वशीभूत होकर सारा जन्म वृथा ही खो दिया, और शेष जीवन भी इस ही भाँति सरकता जा रहा है, बीतता जा रहा है। भूधरदास कहते हैं तू सत्गुरु की सीख को मान और इन इन्द्रिय विषयों से प्रीति तोड़कर इनको अपने वश में करले।
शब्दार्थ: खसकरि = खिसकना, सरकना।
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 80।
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