सम्यक्त्व की रक्षा करो, बातों में मत आओ।
श्री देव-शास्त्र-गुरु का अहो ! श्रद्धान दृढ़ लाओ ॥ टेक ॥
भयभीत मत रहो, कोई भी कर सके बुरा।
आशा भी मत रखो, अरे ! कोई करे भला ॥
बाहर में सुख-दुख है नहीं, अन्तर में सुख पाओ ॥ 1 ॥
कुछ देख चमत्कार, मत चलायमान हो।
निज तत्त्वज्ञान से ही, सहज समाधान हो।।
संयोग तो कर्मोदय से ही, समय पर पाओ॥ 2 ॥
मुक्ति के मार्ग में तो, देव-शास्त्र-गुरु निमित्त।
सम्यक् पुरुषार्थ हो सदा ही, भाव हों पवित्र ॥
कर्तृत्व का अभिमान नहीं, चित्त में लाओ॥ 3 ॥
देखो तुम आगम चक्षु से, मिथ्या विकल्प तज।
जिनराज सम शुद्धात्मा निज, निज माँहि भव्य भज ॥
नित भेदज्ञान ही शरण, सम सुख सहज पाओ ॥ 4 ॥
शंकादि दोषों से सदा ही, दूर ही रहो।
निःशंक हो, आराधना में उद्यमी रहो ॥
निर्दोष हो प्रभावना, निश्चितंता लाओ ॥ 5 ॥
हो मंद सब कषायें, होने योग्य सहज हो।
अरु त्याज्य कामों का, सहज ही त्याग निर्मल हो ॥
नहीं क्रूरता कठोरता, या कुटिलता लाओ॥ 6 ॥
हो सत्य अहिंसा अचौर्य, शील का पालन।
ईर्ष्या-तृष्णादिक शून्य हो, संतोषमय जीवन ॥
दुर्भाव स्वप्न में भी न हों, भावना भाओ॥ 7 ॥
आदर्श हों जिनदेव, नहीं हीनता आवे।
अब पूर्णता के लक्ष्य से, प्रारम्भ हो जावे ॥
अनुशासन में गुरुओं के रहकर, चरण बढ़ाओ ॥ 8 ॥
छोड़ो मिथ्या सब अटकलें, यह वृत्ति है बाधक।
निर्णय करो स्वानुभव करो, यह वृत्ति है साधक ॥
साधना सम्यक् करो, ध्रुव साध्य को पाओ॥ १॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’