ज्ञान गंगा में नित प्रति नहाओ, मैल रागादि का तुम छुड़ाओ | j nana gamga mem nita prati nahao maila ragadi ka tuma chu dao

तर्ज : आज अद्भुत छवि निज निहारी…

ज्ञान गंगा में नित प्रति नहाओ, मैल रागादि का तुम छुड़ाओ।

तोष अमृत पियो अरु पिलाओ, प्यास-तृष्णा की दुःखमय बुझाओ ।। टेक।।

ज्ञान गंगा बहे आत्मा से, आत्मा ही सहज पूर्ण शंकर।
करता पापों का तत्क्षण विलय है, सुख अनुपम का आत्मा निलय है ।।
आत्म आश्रय ले पातक भगाओ ।। 1 ।।

बहता समता का निर्मल सु-पानी, सप्तभंगी तरंगें उछलती ।
दूर करती सु-एकान्त मल को, अनेकान्त स्वभाव दिखाती ।।
ज्ञान सम्यक् सहज ही सु-पाओ ।।2।।

सम्यक् दृग-ज्ञान-चारित्र त्रिवेणी, तीर्थ पावन सु-अनुपम यही है।
एक बार जो डुबकी लगावे, पार भवोदधि से निश्चय ही जावे।।
दर्श पाओ, स्वयं पार जाओ।। 3।।

स्वार्थी पंडों की ना जरूरत, भेद-विज्ञान बुद्धि ही पंडा।
आस झूठी तजो तुम बिरानी, मोह की भेद कर भव्य प्राणी।।
परिणति में सु-गंगा बहाओ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३७६ से ३७७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’