सीमंधर स्वामी, आए शरण तुम्हारी ।। टेक ।।
महाभाग्य से देखी प्रभु की, शान्तमूर्ति अविकारी ।
मोह महातम नष्ट हुआ है, ज्ञानकला विस्तारी ।।1।।
अशरण जंग में भ्रमते-भ्रमते, दुःख सहे हम भारी।
पंच परावर्तन करते भी, हुए न शिवमगचारी ।।2।।
नाथ जगा है भाव हृदय में, तज प्रपंच दुःखकारी।
दीक्षित हो निर्ग्रन्थमार्ग में, हो चैतन्य विहारी।।3।।
रहें परम निरपेक्ष निजातम, ध्यावें मंगलकारी।
अहो ! आप सम प्रभुता पावें, चरणों धोक हमारी ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’