सुनी जब मैंने जिनवाणी
भ्रम तम पटल चीर, दरसायो चेतन रवि ज्ञानी ।।सुनी
काम क्रोध गज शिथिल भए, पीवत समरस पानी ।
प्रगट्यो भेद विज्ञान निजतर, निज आतम जानी ।।सुनी ।।१।।
ध्रुव स्वभाव की रुचि अब जागी, छोड़ी मन मानी ।
निज परिणित की अनुपम छवि, अब मैंने पहचानी ।।सुनी. ।।२।।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), प्रारम्भिक भजन