क्षमावाणी दशक | kshamavani dashaka

क्षमा भाव है मंगलमय, क्षमा भाव है आनन्दमय ॥ टेक ॥
क्षमा अशक्तों का बल जानो, क्षमा है भूषण वीरों का।
क्षमा स्वयं को शान्ति प्रदाता, चित्त हरे सब जीवों का ॥ 1 ॥

क्षमा धर्म का पहला लक्षण, धर्मी की पहिचान अहो।
क्षमा भाव से जीवन सोहे, बैर-विरोध कहीं न हो ॥ 2 ॥

दोष किसी का नहीं दीखता, क्रोध सहज उत्पन्न न हो।
दोष स्वयं का स्वयं ही दीखे, उसे मेटने उद्यम हो ॥ 3 ॥

ज्ञानाभ्यास करें मन मांहि, भेदज्ञान अन्तर में हो।
निजानन्द निज में ही पावें, पर से सहज विरक्ति हो ॥ 4 ॥

द्वेषरूप वैराग्य न होवे, ज्ञानमयी वैराग्य अहो।
क्षण-क्षण बढ़ती भाव विशुद्धि, निज में सहज लीनता हो ॥ 5 ॥

होने पर भी दोष अरे, जो नहीं माँगता क्षमा कभी।
पर का ही वह दोष देखता, नहीं धर्म का पात्र अभी ॥ 6 ॥

क्षमा माँगने पर भी जो नर, सहजपने नहीं क्षमा करे।
वह भी तीव्र कषायी समझो, दुर्गति दुख में मूढ़ परे ॥ 7 ॥

तजकर तुम अभिमान व्यर्थ का, क्षमा करो अरू क्षमा धरो।
दशलक्षण को धारण करके, अपना जीवन सफल करो ॥8॥

जिनवाणी का करो आचरण, शुद्धातम का ध्यान धरो।
व्यर्थ नहीं भटको अब भव में, निज में ही तुम मग्न रहो ॥9॥

उपादेय आतम को आतम, समझो सब ही हेय अहो।
भाव वंदना-भाव स्तवन, तभी आत्मन् सम्यक् हो ॥ 10 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’