समवशरण मनहारी, प्रभु का समवशरण मनहारी।।टेक ।।
अद्भुत शान्त छवि जिनवर की, शोभें मंगलकारी।
शाश्वत सुख का मार्ग दिखावे, सहज सदा अविकारी।।१।।
चतुरानन शिवसुख-प्रदाता, अनन्त चतुष्टय धारी।
परम वीतरागी हैं फिर भी, तिहूँ जग के उपकारी।।२।।
अशरण जग में भव्यजनों को, यही शरण सुखकारी।
निश्चय ही भव भ्रमण मिटावें, दर्शन आनन्दकारी।।३।।
देखो बारह सभा भरी हैं, रचना जग से न्यारी।
दिव्यध्वनि से तीर्थ प्रवर्ते, सब ही को हितकारी।।४।।
पूर्व विदेहीनाथ विराजे, सीमन्धर सुखकारी।
कुन्दकुन्द आचार्य देव का, दर्शन भव दुखहारी।।५।।
रोम-रोम उल्लसित जिनेश्वर, चरणों धोक हमारी।
धन्य दशा ऐसी कब प्रगटे, उस क्षण की बलिहारी।।६।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’