स्वावलम्बी निरालम्बी, निरालम्बी रहूँगा मैं | Svavalambi Niralambi Niralambi Rahug Maim

तर्ज : धन्य मुनिराज की समता …

स्वावलम्बी निरालम्बी, निरालम्बी रहूँगा मैं।

स्वयं में ही सहज संतुष्ट, आनंदमय रहूँगा मैं ।। टेक ।।

भेदविज्ञान वर्ते प्रभु, सहज ही ज्ञानधारा में।
अहो ! निसंग ज्ञायक मैं, सहज निःसंग रहूँगा मैं ।।1।।

परिणमन सर्व द्रव्यों का, सहज स्वाधीन भासित हो।
मिटी कर्तृत्व बुद्धि अब, सहज निर्भार रहूँगा मैं ।।2।।

शून्य परभावों से ज्ञायक, पूर्ण निज में ही है भासित।
अहो ! निर्द्वन्द निर्ग्रन्थ हूँ, सहज ज्ञायक रहूँगा मैं।।3।।

प्रयोजन है नहीं पर से, नहीं कुछ चाह नहीं चिन्ता।
परम प्रभुतामयी ज्ञायक, सहज प्रभु ही रहूँगा मैं।।4।।

धर्म जिनवर का पाया है, यथा अनुभूत मंगलमय ।
ब्रह्मचारी परम निरपेक्ष, मंगलमय रहूँगा मैं ।।5।।

अहो ! परमात्मा शाश्वत, सदा निर्मुक्त निज से ही।
सिद्ध निर्भय सहज स्वाधीन, अविकारी रहूँगा मैं ।।6।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’