संयम भावना | samyama bhavana

उत्तम संयम प्रभु मेरे प्रगट हो जी,

धन्य दिवस हो, धन्य घड़ी हो, होय मुनि विचरूँ सहज जी ।। टेक ।।

जब से अन्तर्दृष्टि भयी जी,
और न भावे, कुछ न सुहावे, आतम में ही रुचि लागे जी।। 1 ।।

विषय हलाहल सम लगे जी,
चर्चा भी नहीं, वार्ता भी नहीं, तनिक सुहावे नाथ जी ।। 2।।

परिग्रह बोझा सम लगे जी,
आरम्भ रूप हिंसा रूप पाप बंध को मूल ही जी।। 3।।

मेल-मिलाप नहीं रुचे जी,
हो एकाकी, हो निजवासी, तृप्त स्वयं में ही रहूँ जी।। 4।।

ज्ञान-ध्यान-तप लीन मुनि जी,
लेश विषय नहीं, लेश कषाय न, रंच मात्र आरम्भ नहीं जी ।। 5 ।।

ध्येय रूप निज ध्यावते जी,
शुद्ध चिद्रूपं, शान्त स्वरूपं, मंगलमय हितकार जी।। 6।।

कब वे साँचे गुरु मिलें जी,
उनके ही संग रहूँ, असंग सुखमय जिनदीक्षा धरूँ जी।। 7।।

अन्य न कोई कामना जी,
निज पद ध्याऊँ, निज पद पाऊँ, आनन्दमय अविकार जी ।। 8।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २८७ से २८८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’