तर्जः रोम-रोम पुलकित हो जाए …
शान्ति विधायक मंगलदायक, शान्ति जिनेश्वर नमन करूँ।
शान्त स्वरूप स्वयं का पाया, शान्ति जिनेश्वर नमन करूँ ।।
नमन करूँ, नमन करूँ, मोह भाव का वमन करूँ।
नमन करूँ, नमन करूँ, निज पद का अनुभवन करूँ ।। टेक ।।
चक्री पद का वैभव त्यागा, धर्मचक्र ले शिवपद साधा।
परम भाव में ही चित पागा ।। शान्ति. ।। 1।।
परम निराकुल, परम जितेन्द्रिय, धन्य-धन्य प्रभु ज्ञान अतीन्द्रिय ।
सकल विभावों पर पायी जय ।। शान्ति. ।। 2 ।।
मुक्तिमार्ग दर्शावनहारी, दिव्यध्वनि प्रभु आनंदकारी।
परम शांत मुद्रा अविकारी ।। शान्ति. ।। 3।।
ख्याति लाभ का भाव विनाशा, भोगों की कुछ नहीं अभिलाषा।
अपना प्रभु अपने में भासा ।। शान्ति ।। 4।।
यही भाव आवे मन माँहि, दुर्विकल्प प्रभु उपजें नाहिं।
सहज रमूँ आतम रस माँहि ।। शान्ति. ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’