सुन प्राणी जिनवाणी, सफल होय जिन्दगानी ।। टेक ।।
काहे अकुलाए, काहे भरमाए, माँ की शरण में क्यों नहीं आये।
जिनवाणी निजभाव बताए, क्षणभर में सब दुःख मिट जाये ।।
कर्मों की हो हानी, सुन प्राणी जिनवाणी ।। 1।।
पर से सुख-दुःख कभी न पाये, निज अज्ञान तुझे भटकाये।
भव-भव का फेरा मिट जाये, सम्यग्ज्ञान की ज्योति जगाये ।।
स्वातम ही सुखखानी, सुन प्राणी जिनवाणी ।। 2 ।।
संयोगों का नहीं भरोसा, व्यर्थ करे तू राग अरु रोषा।
निज में ही पाओ सन्तोषा, व्यर्थ कर्म को तूने पोषा ।।
दुनियाँ आनी जानी, सुन प्राणी जिनवाणी ।। 3।।
द्रव्यदृष्टि से आज निहारो, चेतन अपनो रूप चितारो।
सब संकल्प-विकल्प विडारो, रत्नत्रय परिणति विस्तारो ।।
शिव की यही निशानी, सुन प्राणी जिनवाणी।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’