हे भव्य महा उद्यम से, जिन तत्त्वों को जानो | He Bhavy Mah Udyam Se Jin Tattvom Ko Jano

तर्ज : माता तू दया करके …

हे भव्य महा उद्यम से, जिन तत्त्वों को जानो।

युक्ति से निर्णय कर, ज्यों का त्यों सरधानो ।।टेक।।

जो नहीं जन्मता रे, अरु कभी नहीं मरता।
निज चैतन्य प्राणों से, ध्रुव अजर अमर रहता।।
कर्त्ता नहीं हो पर का, ज्ञाता स्वरूप मानो।।हे भव्य. ।।१।।

भव स्वांगों से न्यारा, शाश्वत स्वरूप अपना।
ज्ञायक प्रभु अन्तर में, बाहर तो सब सपना।।
पर्यायदृष्टि तज कर, ध्रुव आतम पहिचानो।। हे भव्य. ।।2।।

रागादि भाव दुखमय, अरु दुःख के ही कारण।
सम्यक् रत्नत्रय ही, जानो सु तरण-तारण ।
अक्षय आनन्दमय तो, शिवपद ही पहिचानो। ।हे भव्य. ।।3।।

अब व्यर्थ न भरमाओ, मिथ्या जग विषयों में।
तज ज्ञेय लुब्धता तुम, ध्याओ निज को निज में ।।
स्वछन्द वृत्ति छोड़ो, जिन मारग पहिचानो।।हे भव्य. ।।4।।

अब्रह्म भाव दुःखमय, मन में भी मत लाओ ।
निर्ग्रन्थ रूप सुन्दर, अपनाओ प्रगटाओ ।।
अपने में तृप्त रहो, ऐसा उद्यम ठानो।। हे भव्य. ।।5।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’