समयसार अविकार प्रभु, निर्विकल्प निज माँहि रहूँ
समयसार अविकार प्रभु, निर्विकल्प निज माँहि रहूँ,
निज शुद्धात्म स्वरूप दिखाया, किया परम उपकार प्रभु ।
रंग-राग-भेदों से न्यारा, देखन-जाननहार प्रभु ।।टेक।।
सहज मुक्त प्रभु, सहज व्यक्त प्रभु, प्रभुता का नहीं पार प्रभु ।
ज्ञान मात्र भी अनेकान्तमय, शक्तियाँ अपरम्पार प्रभु ।।1।।
क्या छोड़ूँ क्या ग्रहण करूँ? ध्रुव सहज पूर्ण अविकार प्रभु ।
अन्तर में ही अविच्छिन्न झरती, अद्भुत आनंदधार प्रभु ।।2।।
स्वाश्रय से ही प्रगट हआ है, साम्य भाव सुखकार प्रभु ।
काल अनन्त रहूँ निज में ही, पाई तृप्ति अपार प्रभु ।।3।।
सहज होय निग्रन्थ दशा भी, शिव स्वरूप शिवकार प्रभु ।
परभावों की चाह न किंचित्, पाया निज पद सार प्रभु ।।4।।
जगी आत्म रुचि हुई प्रतीति, तिष्ठँ मुक्ति मंझार प्रभु ।
हे आसन्न उपकारी जिनवर, सहज नमन अवकार प्रभु ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ११९ से १२०