हमारे प्रभु परमेष्ठी अविकार | hamare prabhu parameshthi avikara

हमारे प्रभु परमेष्ठी अविकार ।

पाँचों पद के पैंतीस अक्षर, मंत्र जपो नवकार।। टेक।।

सिद्ध प्रभु-गुण आठ सुमरि ले, श्री जिनेन्द्र छियालीस ।
श्री सूरि-गुण छत्तीस राजें, उपाध्याय पच्चीस ।।
मूल अट्ठाईस सर्व साधु के कहता नय व्यवहार।। 1।।

निश्चय से गुण अनन्त विराजें, उनका कथन न होय।
केवलज्ञान प्रकट होते ही, खुद प्रतिबिम्बित होय।।
अतः भाव निज स्वानुभूति से, गहो महा सुखकार।। 2।।

परमेष्ठी निज रूप बतावें, जानत दुःख मिट जाय।
सुखमय शिवपद प्रीति जगे, उर मोह जाल कट जाय ।।
तातें श्री गुरु कहत भव्य ! उर निज परमेष्ठी धार।। 3।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’