सिद्ध स्वरूप सु भावे,
और कछु न सुहावे ।
स्वयं स्वयं में पूर्ण ज्ञानमय,
तृप्त सदैव रहावें। ।टेक ।।
कर्मादिक निःशेष हुए हैं,
नहीं रागादि दिखावें।
अहो ! अतीन्द्रिय अरु अविनाशी,
आनन्दरूप विलसावें ।। 1 ।।
आवागमन विमुक्त हुये प्रभु,
लोक शिखर तिष्ठावें ।
तीर्थंकर भी जो पद ध्यावें,
हम हू सो पद पावें ।। 2 ।।
दुर्विकल्प सब नाशे स्वामी,
जाननहार
रहावें।
धन्य भाग्य श्री सिद्धचक्र-
मंडल विधान सु रचावें ।। 3 ।।
सिद्धचक्र की मंगल भक्ति,
परिणति में विलसावें ।
द्रव्यदृष्टि धरि भक्ति भाव से,
प्रभुवर शीश नवावें ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७४ से २७५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’