ज्ञान दर्शन लक्षण में पाया, जिसमें जाननहार जनाया।
आत्मा ऐसा ही है।॥ टेक ॥
अरिहंत में ही, प्रभु सिद्ध में ही,
आचार्य उपाध्याय साधु में ही।
पंच परमेष्ठी पद मैंने पाया, जिसमें जाननहार जनाया ॥
आत्मा… ।॥1 ॥
केवल ज्ञानमयी, केवल दर्शनमयी,
केवल सुखमयी, केवल वीर्यमयी।
अनंत गुणमयी प्रभु मैंने पाया, जिसमें जाननहार जनाया॥
आत्मा… 112 ।।
शुद्ध द्रव्य मेरा, शुद्ध गुण है मेरा,
शुद्ध पर्याय रूप परिणमन मेरा।
शुद्धात्म मेरी दृष्टि में आया, जिसमें जाननहार जनाया॥
आत्मा… ।॥3 ॥
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १९२ से १९३