हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांड़त दुखदाई | He Nar Bhramanind Kyon Na Chhanr At Dukhadai

हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांड़त दुखदाई

हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांड़त दुखदाई ।
सेवत चिरकाल सोंज, आपनी ठगाई ।।हे नर.।।

मूरख अघ कर्म कहा, भेदै नहिं मर्म लहा,
लागै दुखज्वालकी न, देहकै तताई ।।१।। हे नर. ।।

जमके रव बाजते, सुभैरव अति गाजते,
अनेक प्रान त्यागते, सुनै कहा न भाई ।।२।। हे नर. ।।

पर को अपनाय आप-रूपको भुलाय हाय,
करन विषय दारु जार, चाहदौं बढ़ाई ।।३।। हे नर. ।।

अब सुन जिनवान, राग-द्वेषको जघान,
मोक्षरूप निज पिछान ‘दौल’, भज विरागताई ।।४।। हे नर. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १६२

अर्थ

संसारके मानवके लिए नींद बड़ी ही प्रिय वस्तु है। मनुष्य क्या, प्रत्येक प्राणी नींदमें अपनको अधिकतर सुखी समझता है। नींदके समय मानव, मानसिक विकल्प और शारीरिक क्रिया-कलापसे उन्मुक्त रहता है और चाहता है कि में चिरकालतक इसी तरह पैर पसारे आरामसे सोता रहूँ और कदाचित् इस मनुष्यको पेट-पूतिकी चिन्ता चिन्तित न करे तो वह अपना सम्पूर्ण जीवन निद्राके अंकमें सोता हुआ ही बिता दे। मानव की यह प्रवृत्ति उसकी उत्कट अबोधता और जड़ताकी सूचक है। उसने नींद हीमें अपने जीवनका चरम सुख सन्निहित मान रक्खा है। जानपड़ता है जैसे उसे नींदकी तृष्णा और उसके भयंकर विकल्पोंका आभास ही न हो । यह तो साधारण नींदकी बात है, परन्तु भ्रम-नींद इससे भी दारुण है। भ्रमनींद अज्ञानता, विवशता और दुःखोंकी प्रतीक है और इस नींदमें पड़कर मानवको कितनी भूल-भटक करनी पड़ती है, यह बात प्रत्येक मानवको सहज ही समझमें नहीं आ सकती है। साधारण नींदसे तो मनुष्य सरलतासे जग जाता है, पर भ्रम-नींदमें निमग्न मानवको जगाना अत्यन्त कठिन है। पहलेको दो-चार बार हिलाने-डुलानेसे ही चैतन्य आ जाता हैं, पर दूसरेको चैतन्य करनेमें बरसोंका समय बीत जाता है। पहलेको निद्रित और अर्द्धनिद्रित व्यक्ति भी जगा सकता है और अचेतन पदार्थका आघात भी उसकी निद्रा भंग कर सकता है। परन्तु भ्रम-नींदमें निमग्न मानवके लिए यह सामग्री कुछ भी सहायक नहीं होती। उसे जगाने के लिए किसी एसे. सचेतनका योग ही कारगर हो सकता है, जिसकी आत्म- चेतना स्वयं जाग्रत् और प्रतिबुद्ध हो ।

कलाकार पं० दौलतरामजी आज भ्रमनींदमें पड़े हुए मानवको जागरणका सन्देश सुना रहे हैं। वे कहते हैं- मानव, तुम अब भी अपनी भ्रम-नींद नहीं छोड़ रहे हो ! देखते नहीं, तुम्हें सोते-सोते कितना समय बीत गया ! तुम अब भी इस नींदमें ही सुख मान रहे हो ? इस बीच जो तुम्हें घाटा उठाना पड़ा है, उस ओर भी तो जरा ध्यान दो । कलाकारका संगीतमय जागरण-सन्देश सुनिए:–

स्रोत: अध्यात्म पदावली।

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