तर्ज : पारस प्यारा लागे, परमेश्वर प्यारा लागे…
शुद्धातम अविकारी, शुद्धातम सुखकारी
जयवन्तो तिहुँकाल । । टेक ।।
शुद्धातम को बिन पहिचाने, हुआ बहुत बेहाल ।
आज प्रत्यक्ष अनुभूति प्रगटी, सहजहिं हुआ निहाल ।।। ।।
एक ज्ञान में ही अहो, ज्ञान ही जाना सार।
दुर्विकल्प उपजें नहीं, आनन्द अपरम्पार ।। 2 ।।
अक्षय ज्ञानानन्दमय, गुण पूरण भगवान्।
देहालय में देह से, भिन्न प्रभु अम्लान।।3।।
तृप्त स्वयं में ही रहूँ, वांछा पर की नाँहि ।
हुआ सहज कृतकृत्य लख, निज प्रभुता निज माँहि । ।4 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’