तर्ज : कैसे करूँ गुणगान …
श्री जिनधर्म महान्, जग में श्री जिनधर्म महान्।। टेक ।।
श्री सर्वज्ञ प्रणेता जिसके, ज्ञानी गुरु व्याख्याता जिसके ।
धारक सम्यक्वान।। जग में…।।1।।
वीतराग से देव जहाँ हैं, तत्त्व प्ररूपक शास्त्र जहाँ हैं।
गुरु निर्ग्रन्थ सु-जान ।। जग में… ।। 2 ।।
तत्त्वों का निर्णय हो सुन्दर, भेदज्ञान हो सूक्ष्म निरन्तर ।
स्वानुभूति सुखखान।। जग में…।।3।।
परम धर्म है स्वानुभूतिमय, सम्यग्दर्शन ज्ञान चरितमय।
दशलक्षण अम्लान ।। जग में…।।4।।
परम अहिंसा धर्म यही है, भवि जीवों को शरण यही है।
अविनाशी अम्लान।। जग में… ।।5।।
धर्म नाम पर नहीं भरमायें, धर्मी शुद्धातम को ध्यावें।
हो निज-पर कल्याण ।। जग में… ।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६०