सौ सौ बार हटक नहिं मानी, नेक तोहि समझायो रे | Sau Sau Bar Hatak Nahin Mani Nek Tohi Samajhayo Re

सौ सौ बार हटक नहिं मानी, नेक तोहि समझायो रे

सौ सौ बार हटक नहिं मानी, नेक तोहि समझायो रे ।।टेक।।

देख सुगुरुकी परहित में रति, हितउपदेश सुनायो रे ।।
विषयभुजंगसेय दुखपायो, फुनि तिनसों लपटायो रे ।
स्वपदविसार रच्यो परपदमें, मदरत ज्यों बोरायो रे ।।१।।

तन धन स्वजन नहीं है तेरे, नाहक नेह लगायो रे ।
क्यों न तजै भ्रम चाख समामृत, जो नित संतसुहायो रे ।।२।।

अब हू समझ कठिन यह नरभव, जिनवृष बिना गमायो रे ।
ते विलखैं मणिडार उदधिमें, ‘दौलत’ को पछतायो रे ।।३।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १८२

अर्थ

अरे प्राणी ! तुझे अनेक बार समझाया, पर तू बार-बार मना करने पर भी नहीं मानता। देख, सत्गुरु को पर-कल्याण की भावना में रुचि है इस कारण तुझे तेरे हित का उपदेश दिया है।

विषयभुजंगसेय दुखपायो, फुनि तिनसों लपटायो रे।

विषयभोगरूपी नाग की तूने सेवा की है अर्थात् नाग-सरीखे विषैले विषयों में तू लगा रहा है और अब भी बार-बार उन्हीं में रत है। अपने मूल स्वरूप को भूल करके तू पर में आसक्त होकर शराबी की भाँति नशे में बहक रहा है।

तन धन स्वजन नहीं है तेरे, नाहक नेह लगायो रे।

यह तन, ये स्वजन कुछ भी तेरे नहीं हैं, तू व्यर्थ ही में इनसे मोह किए हुए है। इस मोह के भ्रम को छोड़कर तू संतजनों को सुहावना लगनेवाला आत्म.. हितकारी उपदेशरूपी अमृत का पान क्यों नहीं करता !

अब हू समझ कठिन यह नरभव, जिनवृष बिना गमायो रे।

अब भी समझ ले ! यह मनुष्य भव अत्यंत दुर्लभ है। इसे तूने धर्म-साधन के बिना यूँ ही गँवा दिया और अब भी गँवा रहा है। दौलतराम कहते हैं कि जैसे समुद्र में मणि-रत्न को डालकर फिर उसे पाने के लिए बिलख-बिलखकर, दुःखी होकर पछताना ही पड़ता है, उसी प्रकार तू भी पछतायेगा।

शब्दार्थ: हटक = वर्जन, मना करना।

स्रोत: दौलत भजन सौरभ।

:paperclip: मूल पृष्ठ (छवि):



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