हमको भी बुलवा लो भगवन्, सिद्धों के दरबार में ।। टेक ।।
पराधीन जो है नहीं, सहज शुद्ध अविकार ।
अविचल परमानन्द है, भोगें निज आधार ।।
ऐसे आनन्द के बिना ही जिनराज, भटकते संसार में ।। 1 ।।
द्रव्यदृष्टि से तुम जैसा हूँ, शक्ति है भरपूर ।
निज शक्ति को भूलकर, दुःख पाये हैं भूर ।।
निज शक्ति पहिचान करूँ, अरु पाऊँ समय का सार मैं ।। 2 ।।
निर्मल ध्यान लगाय के, कर्म कलंक जलाय।
भये सिद्ध परमात्मा, वन्दूँ मन-वच-काय ।।
तुम जैसा ही ध्यान करूँ, अरु पाऊँ भव पार मैं ।। 3।।
जो करता सो भोगता, साथी सगा न कोय।
धर्म छुड़ावे दुःख तें, धर्म धरो सब लोग।।
धर्म बिना नहिं तेरो कोई होय अथिर संसार में।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ७४ से ७५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’