श्री चन्द्रप्रभ आरती
जय जय अविकारी, स्वामी जय जय अविकारी ।
हितकारी भयहारी, शाश्वत स्व बिहारी ।। ॐ जय ।।
काम क्रोध मद लोभ न माया, समरस सुखधारी ।
ध्यान तुम्हारा पावन, सकल क्लेश हारी ॥ ॐ जय ।।
हे स्वभावमय जिन तुम चीन्हा, भव संतति टारी ।
तुम भूलत भव भटकत, सहत विपत्ति भारी ॥ ॐ जय ।।
पर सम्बन्ध बन्ध दु:खकरण, करत अहित भारी ।
परमब्रहम का दर्शन, चहुंगति दु:ख हारी ॥ ॐ जय ।।
ज्ञान मूर्ति हे सत्य सनातन, मुनिमन संचारी ।
निर्विकल्प शिव नायक, शुचिगुण भंडारी ।। ॐ जय ।।
रचयिता: श्री सहजानंद वर्णी