हे वीर रे, आए हैं तेरे हम द्वार,
ओ जय जय जय जय, वीर प्रभु जय जय जय जय,
सुन ले तू मन की पुकार, वीर रे।।टेक।।
मोह माया में डूबे हुए हैं, अब तो लगा दो पार,
तू ही दिखा अब रास्ता, ये दुनिया दु:खों का धाम।
मेरे वीरा का यही सम्मान, ओ जय जय…।।१।।
सारे ग्रन्थ का सार यही है, देव निरंजन आत्म,
जीवन में सम्यक् उजियारा, कर पाओ परमात्म।
चेतन तू है स्वयं भगवान्, ओ जय जय…।।२।।
काम क्रोध और लोभ असत्य ही, है दु:खों का डेरा।
बात धर्म की हमको बताएँ, आत्म सुखों का डेरा।
मेरा जीवन बने सुख का धाम,ओ जय जय…।।३।।
मंगलमय मंगल करण, वीतराग विज्ञान।
नमौं ताहि जातै भये अरहंतादि महान्।।
करि मंगल करिहौं महा, ग्रंथकरण को काज।
जातें मिलै समाज सब, पावै निजपद राज।।४।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ २३३ से २३४
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