सोग न कीजे बावरे! मरें पीतम लोग
सोग न कीजे बावरे! मरें पीतम लोग …
जगत जीव जलबुदबुदा, नदी नाव सँजोग॥सोग. ॥
आदि अन्तको संग नहिं, यह मिलन वियोग।
कई बार सबसों भयो, सम्बन्ध मनोग ॥सोग. ॥१॥
कोट वरष लौं रोइये, न मिलै वह जोग।
देखैं जानैं सब सुनैं, यह तन जमभोग ॥सोग. ॥२॥
हरिहर ब्रह्मासे खये, तू किनमें टोग।
‘द्यानत’ भज भगवन्त जो, विनसै यह रोग ॥सोग. ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ११९
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अर्थ
अरे बावले। अपने प्रियजनों की मृत्यु पर तू शौक न कर। इस जगत का जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षणिक है। आत्मा का इस देह से संयोग नदी में नाव के समान अल्पकालीन है। इस आत्मा का यह देह-संयोग अर्थात् मिलन और वियोग शुरू से अन्त तक साथ रहनेवाला नहीं है। इस प्रकार का मनोहर सम्बन्ध अनेक बार सभी प्रकार की देहों से बन चुका है। एक बार पाकर नष्ट हुआ संयोग/सम्बन्ध करोड़ों वर्षों तक रोने पर भी पुनः नहीं मिलता। सब इसे देखते, जानते व सुनते हैं कि यह देह तो यम का भोग/ भोजन है अर्थात् यम का ग्रास है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसों का भी क्षय होता है तो तेरी क्या बिसात है, क्या हस्ती है? द्यानतराय कहते हैं कि तू भगवान का भजन कर जिससे यह मृत्यु-रोग ही नष्ट हो जाए।
हे प्राणी ! न तो हम किसी के हैं और न कोई हमारा है। जग में जो अपने-पन का व्यवहार प्रचलित है, वह नितान्त झूठा है, मिथ्या है। यह सब परिवार इस शरीर से सम्बन्धित है; परन्तु हम जानते हैं कि यह तन भी हमसे न्यारा है, अलग है।
शब्दार्थ: सनबंध = सम्बन्ध।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 80।
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