श्री चन्द्रप्रभ स्तुति | shri chandraprabha stuti

महाभाग्य से दर्शन पाया, चन्द्रप्रभ भगवान्।

तुम्हें देखते दीखे अपना, आतम देव महान्।। टेक।।

अमृतमय है परम अलौकिक, परमानन्द की खान।
परम पारिणामिक ध्रुव ज्ञायक, है शाश्वत भगवान्।। 1।।

ज्ञायक आश्रय से ही प्रगटे, रत्नत्रय अम्लान।
अकृत्रिम परमातम ज्ञायक, अक्षय प्रभुतावान।। 2।।

अपने धर्मों में व्यापक विभु, अद्भुत वैभववान।
है स्वरूप की रचना में, निज से वीरजवान।। 3।।

ध्रुव मंगल है लोकोत्तम है, अनन्य शरण गुणखान।
तेरे सन्मुख आते स्वामिन्, हुआ सहज श्रद्धान।। 4।।

अमृतमय है रूप आपका, अमृतमय परिणाम।
अमृतमय मुद्रा है जिनवर, वचनामृत सुख खान।। 5।।

साँचे देव दिया है प्रभुवर, मुक्तिमार्ग का दान।
हम सम्यक् अनुगामी होकर, करें स्व-पर कल्याण।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’