शेष सुरेश नरेश रटें तोहि, पार न कोई पावै जू
शेष सुरेश नरेश रटें तोहि, पार न कोई पावै जू ।।टेक।।
काटै नपत व्योम विलसतसौ, को तारे गिन लावै जू ।।१।। शेष. ।।
कौन सुजान मेघबूंदन की, संख्या समुझि सुनावै जू ।।२।। शेष. ।।
‘भूधर’ सुजस गीत संपूरन, गनपति भी नहि गावै जू ।।३।। शेष. ।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ४८
अर्थ
हे भगवन। सुर, नर ला अर्थात् देव, मनुष्य आदि सभी तेरा नाम रटते हैं, पर तेरे गुणों का कोई भी पार नही पा सकता। जो आकाशगामी होकर गगन को पार करते हैं, व्योम में स्वच्छन्द विचरण करते हैं वे आकाशगामी भी क्या समस्त तारागण की गिनती कर सकते हैं? कोई भी सत्पुरुष क्या बरसते मेघ की बूँदों की गिनती कर सकते हैं? भूधरदास कहते हैं कि स्वयं गणधर गणपति भी आपके सुयश का सम्पूर्ण गुणगान कर सकने में असमर्थ हैं।
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पद 38।
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