हे धर्म पिता सर्वज्ञ ! हे वीतराग सर्वज्ञ | he dharma pita sarvaj na he vitaraga sarvaj na

हे धर्म पिता सर्वज्ञ ! हे वीतराग सर्वज्ञ !

जयवन्तो जगमाँही, जयवन्तो जगमाँही ।। टेक ।।

प्रभुवर शुद्धातम बतलाया, पर भावों से भिन्न जताया।
ज्ञानानन्द-आपूर्ण दिखलाया, भव में भ्रमते आप बचाया।। 1 ।।

समवशरण की शोभा प्यारी, अतिशय प्रातिहार्य मनहारी ।
पर अलिप्त है दशा तुम्हारी, शत् इन्द्रादिक हों बलिहारी ।। 2 ।।

दिव्यध्वनि अमृत बरसाया, धर्मतीर्थ जग में प्रगटाया।
मुक्तिमार्ग भव्यों ने पाया, गणधरादि ने भी यश गाया।। 3 ।।

ज्ञान नित्य ही दर्शन पावे, तुम सम निज चिद्रूप दिखावे ।
प्रभु सी ही स्थिरता पाऊँ, भाव नमन कर हर्षाऊँ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ६६ से ६७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’