है तेरे घर में जो आतम, उसे तू पर में क्या ढूंढे | Hai Tere Ghar Me Jo Aatam, Use Tu Par Me Kya Dhundhe

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है तेरे घर में जो आतम, उसे तू पर में क्या ढूंढे ।

न गलता है न जलता है, न कमती जासती होता ।
फटक सम खूब निर्मल है, इसे तू पर में क्या ढूंढे ।।1।।

जगत् में चैत चैत्यालय, तेरा दर्शन कराते हैं ।
फकत सहकार हैं तेरे, अगर निज में तू निज ढूंढे ।।2।।

तू ही आनंद दाता है, तू ही समता सुधारी है ।
तू ही मंजन सकल मनहर, तो फिर गंगा को क्या ढूंढे ।।3।।

रचयिता : अज्ञात
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

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स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।

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