हे आदीश्वर ! तुम प्रभुता का नहिं पार दिखावे।
गुण गावें आदीश्वर, जयवन्तो आदीश्वर ।। टेक ।।
जन्म-जन्म की साधना, पूर्ण करन सुखकार।
अन्तिम जन्म भयो प्रभो, गूँजे मंगलाचार ।। १।।
चैत वदी नवमी दिवस, धन्य हुआ साकेत ।
इन्द्र विविध उत्सव किये, हम वन्दें हित हेत ।। २ ।।
कर्म भूमि की रीति भी, सिखलायी प्रभु आप।
आदि पुरुष बुधजन कहें, मेटो जग संताप ।। ३ ।।
देख मरण नीलांजना, करने लगे विचार।
क्षणभंगुर संसार में, शुद्धातम ही सार ।। ४।।
धारा मुनिपद आपने, साधा सहज स्वभाव।
धारा धरि निज ध्यान की, नाशे सर्व विभाव ।। ५ ।।
गुण अनन्त विकसित हुए, कहलाए अरहंत ।
धर्मतीर्थ दरशाय कर, मुक्त हुए भगवन्त ।। ६।।
सिद्धालय में राजते, लोक शिखर अविकार ।
प्रभु प्रभुता में मग्न हो, करते जय-जयकार ।। 7 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ८९ से ९०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’