ज्ञाता सोई सच्चा वे, जिन आतम अच्चा
ज्ञाता सोई सच्चा वे, जिन आतम अच्चा…
ज्ञान ध्यान में सावधान है, विषय भोगमें कच्चा वे॥ज्ञाता. ॥१॥
मिथ्या कथन सुननिको बहरा, जैन वैनमें मच्चा वे॥ज्ञाता. ॥२॥
मूढनिसेती मुख नहिं बोलै, प्रभुके आगे नच्चा वे॥ज्ञाता. ॥३॥
‘द्यानत’ धरमीको यों चाहै, गाय चहै ज्यों बच्चा वे॥ज्ञाता. ॥४॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ६४
खोज: Gyata Soi Sachcha Ve, Jin Atam Achcha
अर्थ
वह ही सच्चा ज्ञाता सुशोभित होता जिसने अपनी आत्मा की, स्व की पूजा की है, उसका सम्मान किया है, उसको जाना है।
वह ज्ञान व ध्यान में पूरा सचेत है, सावधान है। किन्तु विषय भोग आदि में कच्चा है अर्थात् उनके प्रति विरक्त- उदासीन है।
वह मिथ्या कथन सुनने के लिए बहरे के समान है अर्थात् सुनकर भी नहीं सुनता है। परन्तु जिनवाणी सुनने में वह अत्यन्त उत्सुक व तत्पर है।
मूर्खी के आगे वह कुछ भी नहीं बोलता, मौन रहता है। परन्तु प्रभु के सम्मुख वह नृत्य करता है, नाचता है।
द्यानतराय कहते हैं कि वह धर्मात्मा के प्रति साधर्मी भ्रातृत्व भाव, वात्सल्य भाव रखता है- प्रेभ रखता है, जैसे कि गाय अपने बच्चे के प्रति वात्सल्य भाव रखती है।
शब्दार्थ: अच्चा - पूजा, सम्मान ।
स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 161।
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