स्तुति चन्द्रप्रभ जी की, चन्द्र सम उज्ज्वल छवि जिनकी।
सहज ही आनन्दकारी है, सर्व दुख संकट हारी है।। टेक।।
मूर्ति से अमृत झरता है, सहज भव ताप विनशता है।
परम उत्कृष्ट दशा प्रभु की।। 1।।
देह कुल आश्रित क्या स्वामी, करूँ गुणगान परम नामी।
है प्रभुता ज्ञानमयी प्रभु की।। 2।।
मोह विनशावनहारी है, मुक्ति दरशावन हारी है।
दिव्यध्वनि मंगलमय प्रभु की ।। 3 ।।
तुम्हें जो जाने हे जिनवर, स्वयं को समझे वह सत्वर।
कि अद्भुत महिमा है प्रभु की ।। 4 ।।
चन्द्र लख सागर उमड़ावे, तुम्हें लख आनन्द उमगावे।
विभूति रत्नत्रय प्रगटी।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९२ से ९३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’