तर्ज : धन्य-धन्य आज घड़ी…
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र, जीवन हमारा है।
मुक्ति का मार्ग ये ही, गुरुवर उचारा है।। टेक।।
संसार असार जान गुरुवर ने छोड़ा है,
देहादिक भिन्न मान, निज को निज में जोड़ा है।
झूठे सब विकल्प त्याग, परिणाम सम्हारा है।। 1।।
अंतर में देखते हो, अपने को आप ही,
सहज आनंद हो, उपजे न पाप ही।
आदर्श निष्पाप जीवन निहारा है ।। 2।।
स्वाधीन दृष्टि है, स्वाधीन चिन्तन,
स्वाधीन चर्या है, निज में रहें मगन ।
ऐसे सर्व साधुओं को, नमन हमारा है ।। 3।।
तत्त्वों का ज्ञान और श्रद्धान होवे,
आर्त-रौद्र हो न कदा, धर्मध्यान होवे ।
ऐसा ही संकल्प गुरुवर हमारा है ।। 4।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’