सीमन्धर स्वामी ! निज सीमा में आऊँ ।। टेक।।
प्रभो! आपको निज में रमते, देख महासुख पाऊँ।
यही कामना तुम समान ही, मैं भी निज पद ध्याऊँ।।1।।
रहो देह में फिर भी न्यारे, सार्थक नाम विदेही।
देह रहित निज आतम भाऊँ, विभो ! भावना ये ही।।2।।
जग प्रपंच सब मिथ्या भासे, चेतन पद ही साँचा।
हुई उदासी भव भोगों से, अनुभव में मन राँचा।।3।।
ज्ञानमात्र ही निज की सीमा, ज्ञाता सहज रहाऊँ।
आधि व्याधि उपाधि रहित हो, चरणों शीश नवाऊँ ।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’