सिद्ध चक्र मण्डल विधान | Siddh Chakr mandal vidhan

सिद्धचक्र मण्डल विधान सुखकार है।
स्वयं सिद्ध आत्मा नित्य अविकार है ।। टेक ।।

चिर से ही भूल रहा अपने को आप है।
अपने स्वरूप में न पुण्य है न पाप है।।
ज्ञानमात्र आत्मा तो देखन जाननहार है।। 1।।

भिन्न पर्यायों से, भिन्न गुण भेद से।
निरपेक्ष निर्भेद आत्मा स्वभाव से ।।
दृष्टि का विषय यही कारण समयसार है।। 2।।

ज्ञेय-ज्ञान-ज्ञाता अभेद ही प्रमाने।।
तत्क्षण हो दुर्मोह नाशे दुःख कार है।। 3।।

आत्मश्रद्धान आत्मज्ञान आत्म मग्नता।
एकदेश मुक्तिमार्ग, सर्वदेश मुक्तता ।।
ऐसे ही विधान से, होवे भवपार है।। 4।।

मंडल विधान तो है व्यवहार आयोजन।
सिद्ध स्वरूप निज समझना है प्रयोजन ।।
प्रतिबिम्ब सम सिद्ध प्रभु का उपकार है।। 5।।

स्वर: आत्मार्थी शुचि जैन, भिण्ड


स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७८ से २७९