ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै …
राज सम्पदा भोग भोगवै, बंदीखाना धारै ॥टेक॥
धन जोवन परिवार आपतैं, ओछी ओर निहारै ।
दान शील तप भाव आपतैं, ऊंचेमाहिं चितारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥१॥
दुख आये धीरज धर मनमें, सुख वैराग सँभारै ।
आतम दोष देखि नित झूरै, गुन लखि गरब बिडारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥२॥
आप बड़ाई परकी निन्दा, मुखतैं नाहिं उचारै ।
आप दोष परगुन मुख भाषै, मनतैं शल्य निवारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥३॥
परमारथ विधि तीन जोगसौं, हिरदै हरष विथारै ।
और काम न करै जु करै तो, जोग एक दो हारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥४॥
गई वस्तुको सोचै नाहीं, आगमचिन्ता जारै ।
वर्तमान वर्तै विवेकसौं, ममता बुद्धि विसारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥५॥
बालपने विद्या अभ्यासै, जोवन तप विस्तारै ।
वृद्धपने सन्यास लेयकै, आतम काज सँभारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥६॥
छहों दरब नव तत्त्वमाहिंतैं, चेतन सार निकारै ।
‘द्यानत’ मगन सदा तिसमाहीं, आप तरै पर तारै ॥
ज्ञानी ऐसो ज्ञान विचारै ॥७॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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