हे पारस स्वामी ! जीवन हो निर्दोष | He Paras Svami Jivan Ho Nirdos

तर्ज : मुझे है स्वामी उस बल की…

हे पारस स्वामी ! जीवन हो निर्दोष ।

हे पारस स्वामी ! परिणति हो निर्दोष ।। टेक ।।

श्रद्धा हो निर्दोष जिनेश्वर, मैं ज्ञायक हूँ देखूँ।
देह भिन्न है कर्म भिन्न हैं, रागादि भिन्न भी देखूँ ।।
ज्ञान मात्र चैतन्य गुणों से, भरा है अन्तर कोष ।।1।।

नहिं परमाणु मात्र है मेरा, नहिं कुछ भी सम्बन्ध ।
कर्त्ता-भोत्ता मैं नहिं पर का, मैं हूँ सहज अबन्ध ।।
शाश्वत प्रभु के ज्ञान ध्यान से, नाशे सब ही दोष ।।2 ।।

महाभाग्य भवितव्य भला है, पाया मैं जिनशासन ।
किंचित् भाव विशुद्धि भी, उपदेश मिला है पावन ।।
अगणित बार नमन पाये हैं, देव परम निर्दोष ।।३ ।।

धर्म तीर्थ की हो प्रभावना, नित जयवन्त प्रवर्ते ।
रहूँ सहज निरपेक्ष सदा ही, समता परिणति वर्ते ।।
ऐसा हो पुरूषार्थ मिटें सब, मोह क्षोभमय दोष ।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’