स्वयं-स्वयं में सार है, समयसार अविकार है | svayam svayam mem sara hai samayasara avikara hai

तर्ज : भक्ति का प्रसार है …

स्वयं-स्वयं में सार है, समयसार अविकार है।

महिमा अपरम्पार है, वर्ते जय जयकार है।। टेक ।।

भावान्तरों से पार है, आत्मा सहज मुक्त सुखकार है।
प्रभुता का नहीं पार दिखावे, वर्ते निज आधार है।। 1।।

योग युक्ति के पार है, ज्ञायक जाने जाननहार है।
अक्षय गुण भंडार अलौकिक, साँचा तारणहार है।। 2।।

जिसमें कभी विकार न होवे, नय पक्षों के पार है।
अजर अमर अविकार प्रभु, सब धर्मों का आधार है ।। 3 ।।

आओ समझें और अनुभवें, सहज करें स्वीकार है।
व्यर्थ भटकते बहु दुःख पाये, अब पावें भव पार है ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’