तर्ज : रोम-रोम पुलकित हो जाय…
ज्ञानी मुनिवर सुखी महान, सतत करें आतम का ध्यान।
दर्शन कर मन जगा विचार, आतम ही सुख का आधार ॥ टेक ॥
देखो तन पर वस्त्र नहीं, हाथों में कोई शस्त्र नहीं।
बार-बार आहार नहीं, मनमाना व्यवहार नहीं ॥ १॥
जीवन भर स्नान नहीं, फिर भी हो मन म्लान नहीं।
जिनके घर परिवार नहीं, कर्तृत्व का कुछ भार नहीं ॥ 2 ॥
विषयों की कुछ चाह नहीं, चलते उल्टी राह नहीं।
नहीं मोबाईल नहीं टी.वी., राग-द्वेष करते न कभी ॥ ३॥
नहीं पराई जिनको आस, देते नहीं झूठा विश्वास ।
क्षण-क्षण ज्ञानाभ्यास करें, आतम रस में मग्न रहें ॥ 4 ॥
भाव सहित हम करें नमन, परमातम का करें भजन।
पर से सुख तो कभी न होय, हो विमूढ़ जीवन मत खोय ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८७ से १८८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’